by admin@bebak24.com on | 2026-03-19 20:35:31
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अयोध्या (बेबाक24 ब्यूरो): रामनगरी अयोध्या में आज एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक आयोजन संपन्न हुआ। भारत की राष्ट्रपति ने श्री राम जन्मभूमि मंदिर के गर्भगृह में अत्यंत दुर्लभ और 'दिव्य श्रीराम यंत्र' की विधि-विधान से स्थापना की। हालांकि, इस भव्य धार्मिक अनुष्ठान के बीच एक बड़ा राजनीतिक विवाद भी खड़ा हो गया है। चर्चा है कि इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में अयोध्या के स्थानीय सांसद को निमंत्रण नहीं दिया गया, जिसे लेकर अब प्रोटोकॉल और शिष्टाचार पर सवाल उठने लगे हैं।
क्या है 'दिव्य श्रीराम यंत्र'?
शास्त्रों के अनुसार, श्रीराम यंत्र को अत्यंत ऊर्जावान और शुभ माना जाता है।
स्थापना विधि: राष्ट्रपति ने विद्वान पंडितों के मंत्रोच्चार के बीच इस यंत्र को मंदिर परिसर में स्थापित किया।
धार्मिक महत्व: माना जा रहा है कि इस यंत्र की स्थापना से मंदिर की आध्यात्मिक ऊर्जा में और वृद्धि होगी और श्रद्धालुओं को मानसिक शांति की अनुभूति होगी।
राष्ट्रपति का संबोधन: इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा, "राम मंदिर केवल एक ढांचा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकता और अखंडता का प्रतीक है।"
निमंत्रण पर विवाद: सांसद की अनुपस्थिति बनी चर्चा का केंद्र
इतने बड़े आधिकारिक और धार्मिक आयोजन में स्थानीय जनप्रतिनिधि (सांसद) का न होना कौतूहल का विषय बना हुआ है।
सांसद पक्ष: सूत्रों के अनुसार, सांसद कार्यालय का कहना है कि उन्हें इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम के लिए कोई औपचारिक निमंत्रण या सूचना प्राप्त नहीं हुई थी।
विपक्ष का हमला: विपक्षी दलों ने इसे स्थानीय जनता का अपमान बताया है। उनका कहना है कि सरकारी कार्यक्रमों में स्थानीय सांसद को शामिल न करना लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है।
ट्रस्ट की सफाई: हालांकि, राम मंदिर ट्रस्ट या जिला प्रशासन की ओर से इस पर अभी तक कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं आया है।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम
राष्ट्रपति के दौरे को देखते हुए पूरी अयोध्या नगरी को छावनी में तब्दील कर दिया गया था।
जल, थल और नभ से निगरानी रखी गई।
आम श्रद्धालुओं के लिए कुछ घंटों के लिए दर्शन रोक दिए गए थे, जिसे कार्यक्रम के बाद पुनः शुरू कर दिया गया।
Bebak24 विश्लेषण: आस्था बनाम प्रोटोकॉल
अयोध्या में होने वाले कार्यक्रमों में अक्सर प्रोटोकॉल को लेकर खींचतान देखी जाती रही है। राष्ट्रपति जैसा उच्च संवैधानिक पद जब धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा बनता है, तो उम्मीद की जाती है कि सभी स्थानीय गरिमापूर्ण पदों का सम्मान हो। क्या यह केवल एक प्रशासनिक चूक है या इसके पीछे कोई राजनीतिक संदेश, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।
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