by on | 2026-03-16 21:33:50
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वाराणसी। देश की दशा और दिशा तय करने वाली 'जनगणना-2027' की बिसात अब बनारस की धरती पर बिछनी शुरू हो गई है। कहने को तो यह सिर्फ आंकड़ों का खेल है, लेकिन हकीकत में यह वो बुनियाद है जिस पर अगले एक दशक के विकास का महल खड़ा होगा। इसी सिलसिले में सोमवार से यूपी कॉलेज के सभागार में फील्ड ट्रेनर्स के प्रथम बैच को 'दीक्षित' करने का काम शुरू हो गया है। 18 मार्च तक चलने वाले इस प्रशिक्षण में मास्टर ट्रेनर साहबान, मातहतों को हाउस लिस्टिंग और लेआउट मैप की बारीकियां समझा रहे हैं।
'साहब' की नसीहत: लापरवाही पड़ी भारी, तो खैर नहीं!
प्रशिक्षण के पहले ही दिन जिला कलेक्टर और मुख्य जनगणना अधिकारी सत्येंद्र कुमार ने महकमे की क्लास ली। उन्होंने दो टूक शब्दों में कह दिया है कि जनगणना जैसे संवेदनशील और राष्ट्रव्यापी कार्य में 'जी हुजूरी' या 'लापरवाही' के लिए कोई जगह नहीं है। आंकड़ों की गोपनीयता और शुद्धता को लेकर कलेक्टर साहब ने जो कड़े निर्देश दिए हैं, उससे साफ है कि इस बार 'एसी कमरों' में बैठकर खानापूर्ति करने वाले कर्मचारियों पर गाज गिरना तय है।
कैलेंडर तैयार: 22 मई से मचेगा 'घर-घर' शोर
प्रशासन ने जो खाका खींचा है, उसके मुताबिक खेल दो चरणों में होगा:
डिजिटल जोर: 7 मई से 21 मई 2026 तक जनता 'स्व-गणना पोर्टल' के जरिए खुद अपनी कुंडली दर्ज कर सकेगी।
मैदानी जंग: पहले चरण में 22 मई से 20 जून 2026 तक कर्मचारी आपके दरवाजे पर दस्तक देंगे, मकानों की सूची बनाएंगे और ईंट-पत्थरों का हिसाब लेंगे।
बेबाक टिप्पणी:
योजनाएं तो शानदार हैं, लेकिन सवाल वही पुराना है—क्या इस बार जनगणना की टीम उन गलियों के आखिरी मकान तक पहुंचेगी जहां आज भी सरकारी सुविधाएं पहुंचने का रास्ता भूल जाती हैं? अक्सर देखा गया है कि 'हाउस लिस्टिंग' के नाम पर कर्मचारी दरवाजे के बाहर से ही अंदाजा लगाकर फॉर्म भर देते हैं। जब तक धरातल पर ईमानदारी का 'जियोटैगिंग' नहीं होगा, तब तक ये प्रशिक्षण कार्यक्रम सिर्फ चाय-नाश्ते और सरकारी भत्ते तक सीमित रह जाएंगे। क्या डिजिटल पोर्टल का लाभ वो गरीब उठा पाएगा जिसके पास दो वक्त की रोटी का जुगाड़ नहीं, स्मार्टफोन तो दूर की बात है? प्रशासन को 'प्रशिक्षण' के साथ-साथ 'निरीक्षण' का भी सख्त हंटर चलाना होगा, वरना 2027 की जनगणना भी पिछली बार की तरह 'अनुमानों का पुलिंदा' बनकर रह जाएगी।
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