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महादेव के रंग में सराबोर होगी काशी: गौना कराकर लौटेंगे बाबा, ब्रज के रसिया पहली बार खिलाएंगे 'पुष्प होली'

by on | 2026-02-27 16:11:40

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महादेव के रंग में सराबोर होगी काशी: गौना कराकर लौटेंगे बाबा, ब्रज के रसिया पहली बार खिलाएंगे 'पुष्प होली'

वाराणसी | बनारस की गलियों में डमरू बज चुका है और फिजां में अबीर घुलने लगा है। मौका है रंगभरी एकादशी का, जब काशी के कोतवाल बाबा विश्वनाथ अपनी अर्धांगिनी माता गौरा का गौना कराकर लौटेंगे। शुक्रवार को धर्मनगरी केवल रंगों में नहीं, बल्कि आस्था के उस ज्वार में डूबेगी जहाँ महादेव खुद अपने भक्तों के साथ होली खेलेंगे।

परंपरा का निर्वाह: पालकी यात्रा और 'लिमिटेड' भीड़

​काशी की संकरी गलियों की अपनी मर्यादा है। इसी को देखते हुए प्रशासन ने इस बार बाबा की चल प्रतिमा की पालकी यात्रा के लिए श्रद्धालुओं की संख्या 64 तक सीमित रखी है। पूर्व महंत आवास से जब डमरू दल की थाप और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच बाबा निकलेंगे, तो हर-हर महादेव के उद्घोष से आसमान गूंज उठेगा। गर्भगृह में सप्तऋषि आरती के साथ इस अलौकिक उत्सव को पूर्णता मिलेगी।

ब्रज और काशी का महामिलन: 'शिवार्चनम' का शंखनाद

​इस बार की होली साधारण नहीं है। यह काशी और ब्रज की सांस्कृतिक जुगलबंदी का गवाह बनेगी।

  • मथुरा से सौगात: कृष्ण जन्मस्थान से 'गुलाल यात्रा' और रसियारों की टोली काशी पहुंच चुकी है।
  • पहली बार: मंदिर के 'शिवार्चनम मंच' पर ब्रज के कलाकार पुष्पों की होली और रास का ऐसा समां बांधेंगे जो रात 10 बजे तक काशी को थिरकने पर मजबूर कर देगा।
  • काशी का रिटर्न गिफ्ट: बाबा विश्वेश्वर की ओर से लड्डू गोपाल के लिए बनारसी लकड़ी के खिलौने, वस्त्र और गुलाल भेजे गए हैं।
  • "63 तीर्थों का आशीर्वाद:" वैष्णो देवी से लेकर सिद्धिविनायक और केदारनाथ तक, देश-विदेश के 63 प्रमुख मंदिरों से पावन भेंट काशी पहुंची है। यह 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के विचार को जमीन पर उतारने की एक बड़ी आध्यात्मिक पहल है।


    भक्तों के लिए 'ठंडई' और सुरक्षा का पहरा

    ​भीड़ को देखते हुए काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास ने पुख्ता इंतजाम किए हैं। भक्तों के लिए ठंडई और जलपान की व्यवस्था है, तो वहीं पुलिस और प्रशासन ने सुरक्षा का ऐसा चक्रव्यूह तैयार किया है कि दर्शन और उत्सव दोनों सुगमता से संपन्न हों।

    हमारा नजरिया:

    रंगभरी एकादशी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, यह बनारस की उस 'अक्खड़पन' और 'मस्ती' का उत्सव है जो महादेव के बिना अधूरा है। जब ब्रज की लठमार होली का रस काशी की मणिकर्णिका वाली भस्म और गुलाल से मिलेगा, तो दृश्य वाकई दिव्य होगा।



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